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भाजपा को बहुत महंगी पड़ेगी मतदाताओं के धैर्य की परीक्षा

  • जब जब ली गई धैर्य की परीक्षा, खामोश मतदाताओं ने दिखाई अपनी ताकत
  • गुटबन्‍दी में आखिर कब तक अपनी ही पार्टी का सत्‍यानाश करेंगे भाजपा के नेता

 

अरुण सिंह ।

अपनी बात शुरु करने से पहले दो तीन उदाहरण प्रस्‍तुत करना चाहूंगा –

अरुण सिंह

गोरखपुर में एक लोकसभा सीट बांसगॉव सुरक्षित है। इस लोकसभा सीट पर भाजपा के एक सांसद राजनारायण पासी हुआ करते थे। वे चार बार सांसद रहे, यह मतदाताओं का धैर्य था। हर बार होता यह था कि लोग अटल जी के नाम पर उन्‍हें वोट देते थे, पार्टी से अनुरोध करते थे कि किसी और को टिकट दे दें। लेकिन पार्टी कहती थी कि वह सिटिंग एमपी हैं, टिकट नहीं कटता था। 4 टर्म के इस सांसद को तमाम रा‍इजिंग इण्डिया के बावजूद जनता ने अन्‍तत: पटखनी दे दी।

कुशीनगर भी एक लोकसभा सीट है। यहां से रामनगीना मिश्रा भाजपा से चार बार सांसद रहे। यहां की जनता अटल जी के नाम पर ही उनको सांसद बनाती थी। यहां पर सार्वजनिक रुप से नारे लगते थे कि – रामनगीना बहुत कमीना.. फिर भी वोट उसी को देना। यहां भी बार बार धैर्य की परीक्षा ली गई और जनता ने भाजपा के इस प्रत्‍याशी को नकारकर एक निर्दल प्रत्‍याशी को चुनाव जिता दिया।

वर्ष 2004 में निकम्‍मे सांसदों को टिकट दिए जाने से भारतीय जनता पार्टी सत्‍ता से बाहर हो गई थी… वह भी दस साल के लिए । इसके बाद नरेन्‍द्र मोदी का अभ्‍युदय हुआ। उन्‍होने नि:संदेह बेहतर कार्य किया। लेकिन क्‍या उनके सांसदों ने भी वही किया। इस बात का मूल्‍यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि….

  •  उनके सांसद को जनता का समर्थन मिल रहा है
  •  उनका सांसद चुने जाने के बाद जनता के बीच में रहा ?
  •  कार्यकर्ताओं के अन्‍दर मौजूदा सांसद को लेकर उत्‍साह अभी बचा है, या मर चुका है ?
  • उनका सांसद चन्‍द चाटुकारों से तो नहीं घिरा हुआ है ?

 

इन सभी बातों को ध्‍यान में रखते हुए सीटों का निर्धारण करना पार्टी के केन्‍द्रीय नेतृत्‍व का उत्‍तरदायित्‍व होता है। सांसदों के भाग्‍य का निर्धारण दिल्‍ली और लखनऊ में गणेश परिक्रमा से नहीं होता है, बल्कि उनके चुनाव क्षेत्र में होता है। दिल्‍ली में बैठकर लाबिंग करने वाले लोग न तो किसी को कोई वोट दिला सकते हैं और न ही चुनाव जिता सकते हैं। हर बार लहरों के बल पर नौका नहीं पार होती है, नौका पार करने के लिए हाथ में मजबूत पतवार की भी जरुरत होती है। मतदाता और कार्यकर्ता किसी भी नेता के बाप की जागीर नहीं होता है, इस बात को ध्‍यान में रखना चाहिए। यह केन्‍द्रीय नेतृत्‍व की जिम्‍मेदारी है। हमेशा यह बात सामने आती है कि पार्टी टिकट देने के लिए सर्वे करवा रही है। सर्वे के बाद ही उम्‍मीदवार को टिकट मिलेगा। लेकिन क्‍या मतलब होता है इस सर्वे का। शायद ये सर्वे एसी कमरों में बैठकर किए जाते हैं, तभी तो जमीन की वास्‍तविकता नहीं दिखती है इन्‍हें। यह भी हो सकता है कि सर्वे केवल पार्टी का बजट यूटिलाइज करने के लिए किया जाता हो, मनचाहे आंकड़े भरकर और अपनी जेबी कम्‍पनियों को ठेका देकर। तभी तो यह हालत है कि एक प्रत्‍याशी चुनने में पार्टी को नाको चने चबाने पड़ रहे हैं। पार्टी के नेताओं को मालूम होना चाहिए कि वह दिन लद गए जब पार्टी के नेता मनमाना प्रत्याशी दे देते थे और जनता उनको चुनकर सदन में भेज देती थी। कोऊ नृप होहिं हमें का हानी … की तर्ज पर । अब जनता जागरुक हो चुकी है। उसे बहलाया नहीं जा सकता है। वह यह जानने लगी है कि कौन ‘जमीनी’ और कौन ‘गगनबिहारी’ नेता है। इसलिए जनता की नब्‍ज देखो और फैसला लो, अन्‍यथा ‘राइजिंग इण्डिया’ और ‘इण्डिया शाइनिंग’ की हालत किसी से छिपी नहीं है। जनता यह कहने से कदापि नहीं चूकेगी कि –

इलाजे दर्दे दिल तुमसे, मसीहा हो नहीं सकता।

तुम अच्‍छा कर नहीं सकते, मैं अच्‍छा हो नहीं सकता।।

तुम्‍हें चाहूं, तुम्‍हारे चाहने वालों को भी चाहूं ?

मेरा दिल फेर दो, मुझसे ये सौदा हो नहीं सकता।।

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