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मुलायम के ‘पारिवारिक सीट मैनेजमेण्‍ट’  का मोहरा बना ‘आजमगढ़’  

  • आजमगढ़ के लोगों, मत करना ऐसी ऐतिहासिक गलती
  • पूर्वांचल में भी पांव पसार लेगा मुलायम परिवार का बरगद

अरुण सिंह ।

जिस आजमगढ़ सीट से अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के नाम पर वहां के मुस्लिम, यादव तथा अन्‍य जातियों के लोग उछलकूद कर रहे हैं। अखिलेश को जिताने के लिए एक जमीनी यादव दिनेश लाल यादव निरहुआ को वहां के कुछ लोग कुलद्रोही बता रहे हैं। उनको यह मालूम होना चाहिए कि मुलायम परिवार को आजमगढ़ से कोई बहुत लगाव नहीं है, बल्कि पश्चिम में परिवार के सदस्‍यों के लिए कम पड़ती सीटों के चलते अब पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में सीट मैनेजमेण्‍ट करने का एक खेल मात्र है।

अरुण सिंह

प्रदेश के यादव समुदाय के लोगों के साथ विश्‍वासघात करके एक परिवार ने अपने कुनबे का विस्‍तार किया। परिवार के हर सदस्‍य को देश और प्रदेश की बड़ी पंचायतों में पहुंचा दिया। अगर किसी का नुकसान हुआ तो बस वह प्रदेश के यादवों का हुआ। प्रदेश में जिसने भी यादवों का नेता बनने की कोशिश की उसे इस परिवार ने बड़ी ही बेरहमी से कुचल दिया। मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत अपने गुरु नत्‍थू सिंह के राजनैतिक कैरियर को कुचलते हुए की थी। जसवन्‍त नगर सीट से नत्‍थू सिंह लोकदल के विधायक हुआ करते थे। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने जब उनके खिलाफ पर्चा भर दिया तो वे काफी दुखी हुए और चुनाव ही नहीं लड़े। नतीजा यह हुआ कि मुलायम सिंह यादव चुनाव जीत गए और विधानसभा पहुंचे। इसके बाद वे लगातार चुनाव जीतते रहे और समाजवादी पार्टी की नींव रखी। इसके बाद समाजवादी पार्टी का जब उन्‍होने गठन शुरु किया तो खोज खोजकर अपने रिश्‍तेदारों और परिवार के लोगों को पूरे प्रदेश में पदाधिकारी बनाया। यादवों को लुभाने के लिए हर जिले में यादवों को पार्टी का जिलाध्‍यक्ष बना दिया। अयोध्‍या में कारसेवकों पर गोली चलवाने के बाद वे मुसलमानों में लोकप्रिय हुए। इसके बाद कुछ जिलों में आधा दर्जन मुसलमान जिलाध्‍यक्ष बनाए गए। वहीं पर जहां मुसलमानों को लुभाना था। हर जगह पार्टी का जिलाध्‍यक्ष बनकर यादव समुदाय मुलायम को अपना मसीहा मानने लगा। लेकिन मुलायम के दिल में तो कुछ और था। अपने जनपद के आसपास की सीटें उन्‍होने अपने परिवार के लोगों के साथ ही रिश्‍तेदारों में बांट दी। जिस सीट पर कोई कमजोर होता था तो मुलायम सिंह खुद वहां पहुंच जाते थे और उसे चुनाव जिताते थे। जब गिनती होती थी तो यह होता था कि मुलायम सिंह यादव ने 28 यादवों को टिकट दिया है। भोले भाले लोगों को कहा यह पता था कि मुलायम सिंह यादव ने जिनको टिकट दिया है वह उनके अपने ही परिवार के और रिश्‍तेदार हैं। बाद में पडरौना से बालेश्‍वर यादव, आजमगढ़ से रमाकान्‍त यादव, संतकबीरनगर से भालचन्‍द यादव और अन्‍य जिलों से नए यादव नेता उभरने लगे तो मुलायम को चिन्‍ता होने लगी कि कहीं कोई और व्‍यक्ति यादवों का सर्वमान्‍य नेता न बन जाए। इसके बाद उन्‍होने इन नेताओं को कुचलना शुरू कर दिया। जो भी यादव आगे बढ़ा उसका अस्तित्‍व समाप्‍त कर दिया गया। ये सभी नेता इसके जीते जागते उदाहरण हैं।

कई बार प्रदेश का मुख्‍यमन्‍त्री बनने के बाद राजनैतिक पिपासा बढ़ी तो उन्‍होने लोकसभा का चुनाव लड़ना शुरु किया। खुद लोकसभा चुनाव जीते तो आसपास की सीटों को खाली करना शुरु किया। जो भी पुराने सांसद आसपास की सीटों पर थे वहां से उनको जबरिया हटा दिया गया। टिकट काट दिया गया। इनमें से अधिकांश यादव थे। उन सीटों पर अपने परिवारों के छोटे छोटे बच्‍चों से लेकर पतोहू, भाई, भतीजा सभी को बैठाया जाने लगा। लेकिन यादव तो फूलकर कुप्‍पा था कि मुलायम सिंह ने इतने यादवों को टिकट दिया। परिवार के लोगों में बांटते बांटते धीरे धीरे पश्चिम में उनके प्रभुत्‍व वाली सीटें समाप्‍त हो गईं। अगल बगल लोकदल और भाजपा तथा अन्‍य पार्टियों की सीटों पर दखल नहीं दे सकते थे। इसलिए उन्‍होने चूतिया बनाने के लिए खुद आजमगढ़ से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया। यह मुलायम की कूटनीति थी कि अपने परिवार के लिए एक नई सीट पैदा की जाए। अपनी सीट परिवार के दूसरे सदस्‍य को देकर वे आजमगढ़ पहुंच गए। आजमगढ़ में उभर रहे यादव नेता रमाकान्‍त को कुचला और आजमगढ़ की सीट पर कब्‍जा कर लिया। उनकी मंशा पूरी हो गई। इसके बाद वे फिर अपनी मैनपुरी सीट पर चले गए। अखिलेश की सीट मुख्‍यमन्‍त्री बनने के बाद उनके परिवार के अन्‍य सदस्‍य को मिल गई। नेता मुलायम सिंह यादव ने दो सीटों पर चुनाव लड़कर दोनों सीटो पर विजय पाई। इसके बाद आजमगढ़ सीट अपने पास रख ली। बाद में खाली हुई सीट पर अपने ही परिवार के सदस्‍य तेजप्रताप को चुनाव लड़वाकर जिता दिया। यह पूरी तरह से सीट मैनेजमेंट का खेल है।

जबसे भारतीय जनता पार्टी ने निरहुआ को आजमगढ़ से चुनाव मैदान में उतारा है, तभी से उसके उपर वैयक्तिक से सामुदायिक प्रहार हो रहे हैं। आजमगढ़ के यादवों से गालियां दिलवाई जा रही हैं, भावनात्‍मक ब्‍लैकमेलिंग की जा रही है। कहा जा रहा है कि निरहुआ को अखिलेश ने यश भारती सम्‍मान दिया, वही उनके खिलाफ चुनाव लड़ रहा है। क्‍या निरहुआ का अखिलेश से कोई समझौता हुआ था कि हम तुम्‍हें यश भारती दे रहे हैं, तुम हमारे खिलाफ चुनाव मत लड़ना। क्‍या ऐसे ही लोगों को यश भारती दिया गया जो शायद कभी कोई चुनाव लड़ सकते थे। इसलिए यादव परिवार ने एक अहसान लाद दिया यश भारती देकर । संभलने का वक्‍त है आजमगढ़ के लोगों, अगर आज नहीं संभले तो जिन्‍दगी भर के लिए बिक जाओगे और मुलायम नामक यह बरगद पूरे पूर्वांचल पर कब्‍जा कर लेगा और तुमलोग हाथ मलते रह जाओगे।

 

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