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जब घरों में सो रहे थे मसीहा, मनोज राय जागकर परदेशियों को बांट रहे थे भोजन ( देवीलाल गुप्‍त की रिपोर्ट )

  • बूधा से लेकर मगहर तक ब्‍लाक प्रमुख ने पैदल आ रहे लोगों को वितरित किया भोजन
  • जिला अस्‍पताल में भी जाकर जांच करवा रहे युवाओं और चिकित्‍सकों को बांटे पैकेट

संतकबीरनगर, न्‍यूज केबीएन ।

भारत के नामचीन शायर निदा फाजली ने लिखा है कि ….

एक आदमी में होते हैं दस बीस आदमी,

जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।

मैदां में हार जीत तो किस्‍मत की बात है,

टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना ।

कहते हैं कि किसी की वास्‍तविकता तब पता चलती है जब आप उसके करीब होते हैं। दूर से आप वही सुनते और जानते हैं जो लोग कहते हैं। हम भी खलीलाबाद के ब्‍लाक प्रमुख मनोज राय के बारे में बस इतना ही जानते थे। लेकिन जब संकट के दौर में गुजर रही भारतभूमि को कोरोना जैसी महामारी से बचाने के लिए उनके द्वारा किए जा रहे प्रयासों को देखा तो हकीकत सामने आ गई। शायर की इन पंक्तियों का उल्‍लेख इसीलिए किया है।

जिला अस्‍पताल में रात 11 बजे परदेशियों को भोजन देते हुए खलीलाबाद के ब्‍लाक प्रमुख मनोज राय गमछा बांधे हुए

रात 10.20 बज रहे थे। खलीलाबाद नेशनल हाइवे पर नेदुला चौराहे के पास स्थित सेण्‍ट थामस इण्‍टर कालेज की बत्तियां जल रही थीं। वही सेण्‍ट थामस इण्‍टर कालेज जहां पर हमारे संतकबीरनगर के लोग अपने नौनिहालों की शिक्षा के लिए रुपए लुटाते हैं। लेकिन उन जल रही बत्तियों के बीच एक सन्‍नाटा दिख रहा था। उसी सन्‍नाटे के बीच कोरोना के भय से राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या 28 से होकर दिल्‍ली से पैदल वापस लौट रहे लोगों की पदचाप सुनाई दे रही थी। हाइवे पर कोई नहीं दिख रहा था। इसी बीच एक कार पीछे से आकर रुकती है। उसी कार में से उतरते हैं खलीलाबाद के ब्‍लाक प्रमुख मनोज राय। परदेशी और अजनबी पहले तो अचकचाते हैं लेकिन मनोज राय 9 लोगों के उस ग्रुप के लोगों से यह पूछते हैं कि आप लोगों ने भोजन किया है या नहीं। जबाव ना में मिलते ही मनोज राय तुरन्‍त कार की डिग्‍गी खोलते हैं और नौ लंच पैकेट के साथ ही पानी की बोतले उनको देते हैं। साथ ही यह बताते हैं कि यहां से 500 मीटर दूर जाकर बाई तरफ मुड़ जाइयेगा, जिला अस्‍पताल में अपनी जांच करवा लीजिएगा। जरुरत पड़े तो वहीं पर सो जाइयेगा। सुबह जहां जाना होगा जाइयेगा। परदेशी वहां से चल देते हैं और मनोज राय की गाड़ी आगे निकल जाती है। रास्‍ते भर परदेशियों जिनसे उनका शायद कोई मतलब भी नहीं सिद्ध होगा वे बूधा से लेकर मगहर तक उनको भोजन बांटते हैं। इसके बाद रात 11 बजे जिला अस्‍पताल पहुंचते हैं। वहां पर जांच करवा रहे लोगों को देखते हैं और पूछते हैं कि कितने लोगों ने भोजन नहीं किया है। 10 – 12 लोग सामने आते हैं। इसके बाद वे खुद जाकर अपनी गाड़ी से इन पैकेटों को निकालते हैं और लोगों के सामने रख देते हैं। कहते हैं कि जिसको जितना भी भोजन करना हो वह कर ले। परदेश में जाकर मजदूरी करने वाले लोग ईमानदारी से उन थैलों में से अपने काम भर का भोजन निकालते हैं। इसके बाद मनोज राय पूरा थैला वहां पर लोगों की चेकिंग कर रहे जिला अस्‍पताल के लैब टेक्‍नीशियन सौरभ श्रीवास्‍तव और शैलेन्‍द्र श्रीवास्‍तव को दे देते हैं। साथ ही यह कहते हैं कि आप लोग भी खा लीजिएगा, शायद बहुत देर से जांच कर रहे हैं। कोई आए और भोजन नहीं किया हो तो उनको ये पैकेट दे दीजिएगा। दोनो स्‍वाथ्‍यकर्मी उन्‍हें भरोसा देते हैं कि वे तो अपने घर से भोजन मंगवा रहे हैं। अभी कोई लेकर आता ही होगा, लेकिन हम हर आने वाले व्‍यक्ति को जांच के बाद भोजन जरुर कराएंगे। आपकी यह सेवा देश के लोगों के लिए एक अमूल्‍य भेंट साबित होगी।

भूख क्‍या होती है…. इस परदेशी से पूछ लेना। शायद वह भूख की असली परिभाषा बता देगा जो विपत्ति के समय में भोजन पा गया। इस व्‍यक्ति का चेहरा खुद ब खुद भूख की कहानी को विस्‍तार से कहता नजर आ रहा है जिसकी क्षुधा को शान्‍त किया खलीलाबाद के ब्‍लाक प्रमुख मनोज राय ने ।

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