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सत्‍य सुनकर ‘पोरस के हाथी’ न बनें यूपी पुलिस के अधिकारीगण

  • जिस पुलिस ने इतनी लानत मलानत सहकर कोरोना को रोका है तो व्‍यवस्‍था बिगड़ने पर उसे दर्द होगा ही
  • लाकडाउन में शराब की बिक्री पर रोक लगाने की बात करने वाले एसीपी अनिल कुमार पर खफा क्‍यों है अधिकारी

अरुण सिंह।

अवतार सिंह संधू ‘पाश’ की एक कविता याद आती है….

ज़हरीली शहद की मक्खी की ओर उंगली न करो 

जिसे आप छत्ता समझते है 

वहां जनता के प्रतिनिधि रहते है।

संसद को केन्‍द्र में रखते हुए लिखी हुई अपनी इस कविता में उन्‍होने वास्‍तविकता दिखाने का एक प्रयास किया है। ऐसा उन्‍होने लिखा तो उसके कारण भी रहे होंगे। शायद आज की परिस्थितियों को ध्‍यान में रखते हुए ही उन्‍होंने यह क्रान्तिकारी कविता लिखी थी। शायद कुछ ऐसा ही हुआ खलीलाबाद में सीओ रहे तथा वर्तमान में पुलिस विभाग में लखनऊ में एसीपी अनिल कुमार के साथ। उनकी एक ट्वीट उनके उपर भारी पड़ती दिख रही है। लाकडाउन के दौरान शराब की दुकानों के खुलने को लेकर उन्‍होने ट्वीट किया कि ‘‘शराब बिक्री पर तत्‍काल रोक लगाई जानी चाहिए…40 दिनों की मेहनत बर्बाद हो रही है।’’

एसीपी अनिल कुमार सम्‍मान प्राप्‍त करते हुए

पुलिस विभाग में ईमानदार, कर्तव्‍यनिष्‍ठ और निडर पुलिस अधिकारियों में गिने जाने वाले अनिल कुमार ने दोपहर 1 बजकर 18 मिनट पर यह ट्वीट किया। इसके बाद से ही वे पुलिस अधिकारियों के साथ ही नेताओं के निशाने पर आ गए। उनको इस तरह से ट्रीट किया गया कि अन्‍तत: 7 घण्‍टे बाद उनको फिर एक ट्वीट करनी पड़ी कि – ‘‘ अनजाने में एक गलत ट्वीट हो गया, मैं क्षमा मांगता हूं।’’ इधर पुलिस विभाग के अधिकारियों के बीच यह मंथन चलने लगा था कि अनिल कुमार को निलम्बित किया जाय। रुल और रेग्‍यूलेशन का हवाला देकर तरह तरह की बातें। पुलिस विभाग में अधिकारियों की मनोदशा ‘पोरस के उन हाथियों की तरह ही होती है जो सिकन्‍दर से हुए युद्ध के दौरान अपनी ही सेना को कुचलने लगे थे, नतीजा यह हुआ था कि पोरस को जीता हुआ युद्ध सिकन्‍दर से हारना पड़ा था। उनकी ट्वीट गलत नहीं थी, सही थे उनके विचार। क्‍योंकि उन्‍होंने वह सब देखा था, पुलिसकर्मियों ने लाठियां चलाई थीं। लोगों को लॉकडाउन में अपने घरों में भेजा था। तमाम पुलिसकर्मी लोगों को संभालने और कानून व्‍यवस्‍था के नियन्‍त्रण के दौरान कोरोना की चपेट में आ गए। इनमें पुलिस लाइन्‍स के प्रतिसार निरीक्षक के साथ ही एलआईयू के आफिसर और तमाम पुलिसकर्मी और उनके परिवार हैं। उनकी पीड़ा जायज भी कही जाएगी। जिस कोरोना को रोकने के लिए पुलिस ने इतना बड़ा बलिदान दिया, कई रातों तक सोए नहीं, लोगों की सेवा के साथ ही साथ अपनी ड्यूटी भी निभाई, बिना किसी सुरक्षा उपकरणों के वे 40 दिनों तक तपस्‍या करते रहे, लोगों के जीवन को बचाने के लिए। कोई सचमुच सब्‍जी लेने, परिवार की जरुरतों का सामान लेने के लिए निकला था तब भी उसे घुमा दिया। एक लक्ष्‍मण रेखा तैयार की थी, कोरोना से बचने के लिए। जब वह लक्ष्‍मण रेखा का उल्‍लंघन होगा तो दुख होना स्‍वाभाविक है। लेकिन उनके उपर इस कदर मानसिक दबाव बनाना, दुखद है। बाजार में कोई नमक का बोरा लेकर बैठे, और कोई टेस्‍ट खराब कहे तो उससे जबरिया तो यह बुलवाया नहीं जा सकता है कि यह मीठा है, या फिर यह कहा जाए कि  तुम्‍हारी जबान ही खराब है। हमारे देश के महामहिम लोगों के जो टिवटर हैं उसपर इंसानों की अभिव्‍यक्ति आए, जनता की अभिव्‍यक्ति आए….या फिर जिन्‍हें अभिव्‍यक्ति की आजादी हैं उनकी अभिव्‍यक्ति आए तो ठीक है, अगर कोई पुलिस अधिकारी एक व्‍यावहारिक चीज को सही कह रहा है तो वह खराब हो गया। वह भी ऐसा पुलिस अधिकारी जिसने ईमानदारी से अपने कर्तव्‍यों का निर्वहन किया हो। बिना किसी भेदभाव के सभी का काम किया हो। यह कतई उचित नहीं है। पुलिस विभाग के उच्‍चाधिकारियों को भी ध्‍यान देना होगा कि वे हस्तिनापुर के सिंहासन से बंधे हैं तो उनकी भी जिम्‍मेदारी है कि जब द्रौपदी का चीरहरण हो तो राजा के सामने वे यह कहने का साहस कर सकें कि यह गलत है, ऐसा नहीं होना चाहिए। अन्‍यथा श्रीरामचरित मानस के रचनाकार गोस्‍वामी तुलसीदास का यह दोहा अपनी प्रासंगिकता पूरी कर ही लेगा कि ….

सचिव, वैद्य, गुरु तीनि जौ, प्रिय बोलहिं भय आस।

राज, धर्म, तन तीनि कै, होहिं बेगिहीं नाश ।।

पीड़ा में आनन्‍द जिसे हो, आए मेरी मधुशाला

एसीपी अनिल कुमार ने अपने ट्विेटर एकाउण्‍ट के स्‍टेटस में हरिवंश राय बच्‍चन की एक कविता लिखी है, जिसमें उन्‍होने लिखा है कि ‘ पीड़ा में आनन्‍द जिसे हो, आए मेरी मधुशाला ‘ उनके द्वारा अपने एकाउण्‍ट के स्‍टेटस में लिखी इन दो लाइनों के तमाम निहितार्थ दिखाई दे रहे हैं। शायद वे अपनी पीड़ा कह रहे हों, या फिर कोरोना के भय से उबरने का मार्ग बता रहे हों, लेकिन अनजाने में ही सही एक समीचीन टिप्‍पड़ी भी कर दी है।

एसीपी अनिल कुमार की वह ट्वीट जो बनी विवाद का कारण

एक नजर अनिल कुमार पर भी…..

अनिल कुमार संतकबीरनगर में खलीलाबाद के क्षेत्राधिकारी के तौर पर रहे। उन्‍होने उस समय पुलिस विभाग में आए तमाम युवाओं को ट्रेण्‍ड किया। उन्‍हीं के बल पर उन्‍होने समाजवादी पार्टी के शासन में एसओजी के द्वारा चलवाए जा रहे जुए के अड्डों, गांजा के अड्डो, अवैध शराब के कारोबार, गौतस्‍करी तथा अन्‍य अवैध कार्यों पर नकेल कसी थी। उनके द्वारा ट्रेण्‍ड किए गए पुलिस के रंगरुट आज हर जगह अपनी उपलब्धियों का डंका बजा रहे हैं। नगर पालिका चुनाव के दौरान जब उन्‍होने आचार संहिता के उल्‍लंघन में दो दर्जन से अधिक चारपहिया वाहनों को कोतवाली में लाकर बन्‍द किया था तो एक नेता के दबाव में समाजवादी पार्टी की गाड़ी को थाने से छोड़ दिया गया। इसके बाद जब वे कोतवाली पहुंचे तो देखा कि समाजवादी पार्टी की गाड़ी वहां से चली गई है। इसके बाद उन्‍होने भाजपा, बसपा और पीस पार्टी के वाहनों के स्‍वामियों को बुलाकर बाइज्‍जत उनकी भी गाडि़यों को छोड़ दिया। उनके यही शब्‍द थे कि ‘ जब सपा की गाड़ी छोड़ दी गई तो भाजपा वाले हमारे दुश्‍मन थोड़े ही हैं। गोवंशों के 1200 चमड़ों से भरी गाड़ी को उन्‍होने पकड़ा था, लेकिन जब उनके उपर राजनैतिक दबाव बनने लगे तो उन्‍होने तुरन्‍त कोर्ट की प्रक्रिया पूरी की और माल नमूना रखकर दूसरे ही दिन जेसीबी से गड्ढ़ा खोदवाकर उन चमड़ों को इण्‍डस्ट्रियल एरिया में नमक और तेजाब डालकर दफन करा दिया कि वे किसी काम के लायक न रह जाएं। ऐसे कर्तव्‍यनिष्‍ठ पुलिस अधिकारी के उपर कोई बेवजह की कार्यवाही हो तो दर्द होना स्‍वाभाविक ही है।

संतकबीरनगर में सीओ के रुप में तैनाती के दौरान यह थे अनिल कुमार के तेवर

एसीपी अनिल कुमार को बाद में ट्वीट करके मांगनी पड़ी माफी

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