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रेनकोट, मनमोहन सिंह और मोदी…..

आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में लिखा है कि ‘जिस राजा के चारों तरफ भ्रष्टाचारी और अनाचार को सहने वाले लोग अपना कार्य निर्बाध रूप से करते रहें उस राजा का शासन ग्रहण युक्त चन्द्रमा की तरह होता है जिसकी रोशनी से सामान्य जन में विकार व रोगयुक्त होने की संभावना भरी रहती है। इसलिए राजा को अपने आसपास रहने वाले बुद्धिमानों तक के कार्यकलापों से सर्वदा परिचित रहना चाहिए’। महाभारत में जब महाराज धृतराष्ट्र की राज्यसभा में द्रोपदी का चीरहरण हुआ तो उस समय के नीतिकार ‘महात्मा विदुर’ ने उसकी व्याख्या जिस प्रकार की उसे आज भी सन्दर्भहीन नहीं कहा जा सकता। महात्मा विदुर ने कहा कि ‘राजा अन्धा हो सकता है किन्तु प्रजा अन्धी नहीं होती। नेत्रहीन व्यक्ति की अन्तरंग आंखें भी अत्याचार से आर्तनाद करने लगती हैं क्योंकि वातावरण को महसूस करने वाली उसकी स्पर्शिकाएं भी सामान्य नेत्रयुक्त व्यक्ति के समान ही काम करती हैं’।

अश्विनी कुमार, सम्‍पादक, पंजाब केसरी

भारत के इन दो महाविद्वान नीतिकारों की वाणी हर युग में सन्दर्भ युक्त न रहे इसका कोई कारण समाज के निरन्तर परिवर्तित व प्रगतिवादी रहने के बावजूद नहीं हैं। संसद के उच्च सदन राज्यसभा में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने भूतपूर्व प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह के बारे में यह टिप्पणी करके ‘शिष्टाचार’ का किसी भी स्तर पर उल्लंघन नहीं किया है कि उनकी पिछली सरकार में घोटाले पर घोटाले होते रहे मगर उनकी निजी ईमानदारी पर किसी ने भी शक की उंगुली नहीं उठाई। ‘रेन कोट पहन कर स्नान करने की कला कोई उनसे सीखे’। यह निश्चित रूप से कटाक्ष है मगर इसकी ध्वनि ‘नकरात्मक’ नहीं बल्कि ‘सकारात्मक’ है। डा. मनमोहन सिंह के शासन में पृथ्वी से लेकर आकाश और पाताल तक में स्थित ‘राष्ट्रीय सम्पदा’ के घोटाले पर घोटाले हो रहे थे और डा. मनमोहन सिंह की सरकार के मन्त्रियों के नाम और उनकी पार्टी के नेताओं के नाम उछल रहे थे मगर डा. सिंह के लिए किसी ने यह नहीं कहा कि ‘बेइमानी’ में उनका भी हाथ हो सकता है। निजी तौर पर उनकी ईमानदार नेता की साख को किसी ने चुनौती नहीं दी। बेशक उनकी सरकार भ्रष्ट थी मगर निजी तौर पर वह ईमानदार समझे गये। मौजूदा दौर की राजनीति में यह एक विशिष्ट गुण उसी तरह समझा जायेगा जिस प्रकार ‘काजल की कोठरी में रहते हुए भी कोई व्यक्ति उजला’ ही रहे। वस्तुत: श्री मोदी ने डा. सिंह के लिए इसी लोकोक्ति या मुहावरे का प्रयोग किया है मगर वह दूसरे शब्दों में किया है। स्नानागार में नहाते हुए हर व्यक्ति का शरीर गीला होगा। जो व्यक्ति बिना गीला हुए ही स्नान कर आये उसे हम ‘रेनकोट या बरसाती’ पहन कर स्नान करना ही कहेंगे। वस्तुत: रेनकोट पहन कर स्नान करना ‘अंग्रेजी’ का मुहावरा है जो ‘काजल की कोठरी’ में उजला रहने के हिन्दी मुहावरे का स्थानापन्न है। अत: इसमें डा. सिंह के प्रतिकार की भावना नहीं है। मगर विपक्ष इस मुद्दे को तूल देकर अपनी खिजलाहट मिटाना चाहता है। संसद के दोनों सदनों में श्री मोदी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चली चर्चा का उत्तर दिया उससे यह सिद्ध हो गया कि उनके और उनकी सरकार के केन्द्र में देश का ‘गरीब’ आदमी है। विपक्ष खास कर कांग्रेस व कम्युनिस्ट कह रहे हैं कि प्रधानमन्त्री ने राजनीतिक चर्चा का स्तर गिरा दिया है। ऐसा करके वह अपना नुकसान किस कदर कर रहे हैं इसका भान उन्हें कुछ समय बाद जरूर होगा मगर तब तक बाजी उनके हाथ से निकल चुकी होगी। इतिहास खुद को किस तरह दोहराता है यह भी स्वयं में कम विस्मयकारी नहीं है। जब 1969 में कांग्रेस पार्टी का पहला विघटन करने की बेला में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने बाहैसियत वजीर-ए-आजम 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण आधी रात को अध्यादेश जारी करा कर किया था तो अगले दिन कोहराम मच गया था और इसके कुछ दिनों बाद अलग हुए संगठन कांग्रेस के नेताओं ने उन पर आरोप लगाने शुरु कर दिये थे कि उन्होंने राजनीति की बहस को ‘सड़क छाप’ बना डाला है लेकिन आम जनता ने इन्दिरा गांधी के उस अन्दाज को पसन्द किया था जिसमें उन्होंने शिखर राजनीति के पेंचों को सड़कों पर खोलने का फैसला किया था आज वे कांग्रेसी ही श्री मोदी व भाजपा पर वैसे ही आरोप लगा रहे हैं जैसे 1970 में इन्दिरा जी के विरोधी उन पर लगाया करते थे। कांग्रेसियों ने इतिहास से कुछ नहीं सीखा वे केवल ‘परिवारवाद’ के साये में ही जीना चाहते हैं तो कोई क्या कर सकता है? अगर काजल की कोठरी वाला मुहावरा अपमानजनक न होकर सम्मान सूचक है तो रेनकोट पहन कर स्नान करना किस तरह अपमानजनक हो सकता है? जबकि दोनों का भाव व आशय या निहितार्थ एक ही है। डा. मनमोहन सिंह के लिए तो जमाने की सबसे बड़ी अदालत से लेकर खुदा की अदालत तक में हलफनामा उठाया जा सकता है कि वह एक ईमानदार आदमी हैं। उन पर आचार्य चाणक्य और महात्मा विदुर की नीति इसलिए लागू नहीं होती क्योंकि वह आज भी एक राजनीतिज्ञ नहीं हैं। प्रधानमन्त्री पद उन्हें कांग्रेसियों ने अपना उल्लू साधने की गरज से ही सौगात में दिया था और हुआ भी यही। यार लोगों ने मुल्क के माल को मुफ्त में मिली सौगात बना डाला।

( अश्विनी कुमार पंजाब केशरी के  सम्‍पादक हैं। उनकी यह सम्‍पादकीय उसी समाचार पत्र से ली गई है )

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