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औरंगजेब, डलहौजी और दाराशिकोह…..

अश्विनी कुमार, सम्‍पादक पंजाब केशरी

राजधानी में कुछ समय पहले औरंगजेब रोड का नाम बदल कर डा. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया था। अब एनडीएमसी परिषद ने डलहौजी रोड का नाम औरंगजेब के भाई दारा शिकोह के नाम पर रखा है। आलोचना करने वाले कह रहे हैं कि साम्राज्यवादी विलय नीति अपनाने वाले लार्ड डलहौजी के नाम को हटाना तो अपनी जगह है लेकिन उसकी जगह दारा शिकोह के नाम पर सड़क के नामकरण के पीछे भाजपा शासित नगर निगम की सियासी लाभ लेने की मंशा से इंकार नहीं किया जा सकता है। यह भी आरोप लगाया गया कि उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों से पहले मुस्लिम मतदाताओं को लुभाने के लिए डलहौजी रोड को दारा शिकोह रोड में बदलने के प्रस्ताव को सावधानीपूर्वक बढ़ाया गया है। मैं ऐसी प्रतिक्रियाओं पर हैरान हूं कि यदि सड़कों का नामकरण बदलने से वोट मिल जाते तो सरकारें हर सड़क का नाम बदल देतीं। राजनीतिज्ञ साथ में अपने नामपट्ट भी खुदवा लेते। अगर सड़क का नाम बदलने से ही मुस्लिम मतदाताओं को लुभाया जा सकता तो हर कोई ऐसा करने को तत्पर रहता। इसलिए विपक्ष के आरोप बेमानी हैं। दारा शिकोह एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उन्हें वाजिब सम्मान नहीं मिला। उन्होंने हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काम किया था। कई इतिहासकार उनके व्यक्तित्व को अलग-अलग पहलुओं से देखते हैं लेकिन यह सत्य है कि मुगलकाल में भारतीय साहित्य में दारा शिकोह अद्भुत सितारा बनकर उभरा था। अगर मुगलिया सल्तनत की बागडोर दारा शिकोह के हाथ में होती तो देश के साहित्य जगत का भविष्य कुछ और होता लेकिन गद्दी प्राप्त करने के लिए हुई सियासत में औरंगजेब ने अपने सगे भाई और विशुद्ध साहित्यकार को मरवा डाला और कटे सिर को हुमायूं के मकबरे में दफना दिया था। दारा शिकोह बौद्धिक दृष्टि से अपने पितामह अकबर के गुणों व आदर्शों का अनुयायी था। वह सूफीवाद और इस्लाम के हनफीपंथ का अनुयायी था। विश्व देववासी दर्शन पर उसका विश्वास था। इसी से प्रेरित होकर उसने हिन्दू वेदांत, उपनिषद और बाइबल का अध्ययन किया। वह हिन्दू योगी लालदास तथा मुस्लिम फकीर सरमद का समान रूप से शिष्य था। उसने दोनों से सद्विचारों को ग्रहण किया। वह काफी जिज्ञासु प्रकृति का था और संत-महात्माओं से मिलता रहता था। ऐसे अनेक चित्र मिलते हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि दारा हिन्दू संन्यासियों और मुसलमान फकीरों की संगत में रहता था। हिन्दू दर्शन और पुराणों से प्रभावित होकर उसने अनेक कृतियों को पढ़ा और 52 उपनिषदों का अनुवाद सीर-ए-अकबर ग्रंथ में किया है। उसने सफीनात अल औलिया व सकीनात अल औलिया सूफी संतों पर लिखीं। उसने रिसाला के हकनुमा और तारीकात-ए-हकीकत सूफी दार्शनिक पुस्तकें भी लिखीं। वेदांत और सूफीवाद की तुलना कर उसने मजमा अल बहरेन ग्रंथ की रचना की। उसने योग वशिष्ठ और भगवद् गीता का फारसी में अनुवाद किया। अध्यात्म से उसका लगाव बचपन से ही रहा। जातिगत सहिष्णुता और भारत में हिन्दू-मुस्लिम एकता में उसका अटूट विश्वास था। वह दोनों धर्मों के बीच आपसी समझ बढ़ाने का पैरोकार बन चुका था। शाहजहां अपने इस विद्वान पुत्र को उत्तराधिकारी बनाना चाहता था लेकिन मुगलिया सल्तनत का अभागा युवराज भाई औरंगजेब की क्रूरता का शिकार हो गया। औरंगजेब ने उसे धर्मविरोधी करार दिया था। औरंगजेब से बार-बार हारने के कारण दारा ने दादर के अफगान सरदार जीवन खान का आतिथ्य स्वीकार कर लिया जो गद्दारी कर गया और धोखे से उसके पुत्र और पुत्रियों को कैद करा कर बहादुर खां के माध्यम से औरंगजेब के हवाले कर दिया। दारा को बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया। उसे भिखारी की पोशाक में हथिनी पर बैठाकर पूरे शहर में घुमाया गया। उस पर धर्म द्रोह का आरोप लगाकर मौत की सजा सुनाई गई। औरंगजेब ने हिन्दुओं पर बहुत अत्याचार किए जिस कारण हिन्दुओं की रक्षा के लिए सिख गुरुओं को तलवार उठानी पड़ी और शहादतें देनी पड़ीं। उस आतताई औरंगजेब को हम क्यों याद करें, उसके नाम पर देश की सड़कें क्यों हों? ऐसा उसने कौन सा काम किया कि हम उसे सम्मान से नवाजें।

हम साम्राज्यवादी लार्ड डलहौजी को भी क्यों याद करें, हम क्यों गुलामी के प्रतीकों को याद रखें। राष्ट्रपति भवन से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित डलहौजी रोड का नाम लार्ड डलहौजी के नाम पर रखा गया था, जो 1848 से 1856 तक भारत का गवर्नर जनरल रहा था। एनडीएमसी ने हिन्दुओं और मुसलमानों को साथ लाने के लिए दारा शिकोह के सम्मान में इस सड़क का नामकरण फिर से कर दिया।

दूसरी ओर इतिहासकारों ने सड़क का नाम बदलने की आलोचना की है। उनका कहना है कि किसी को भी अतीत में दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए। एक शहर के जीवनकाल में अतीत और वर्तमान शामिल होता है और अतीत चाहे अच्छा हो या बुरा, उसे मिटाया नहीं जा सकता। ये नाम केवल नाम नहीं हैं, बल्कि हमारे अतीत का दस्तावेज हैं। इतिहासकारों के अपने तर्क हैं लेकिन मैं यह बात समझ नहीं पाया कि अच्छे लोगों के बारे में बात करना गुनाह क्यों हो जाता है। सब औरंगजेब की बात तो करते हैं लेकिन कोई भी विद्वान दारा शिकोह की बात क्यों नहीं करता। दारा शिकोह के समय की किताबें भी नष्ट हो गई हैं, जो बची हैं वह खुदाबख्श लाइब्रेरी पानीपत और रजा लाइब्रेरी रामपुर में मौजूद हैं। उस दौर की पुस्तकों को सम्भाला जाना चाहिए ताकि दारा शिकोह का संदेश पूरे भारत में जाए। मुगलों के सबसे काबिल विद्वान शहजादे की स्मृतियां जीवित रहनी ही चाहिएं।

( अश्विनी कुमार पंजाब केशरी के सम्‍पादक हैं। यह लेख उनके समाचार पत्र में छपा है)

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