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चुनाव: ‘गरीब’ की पहुंच से दूर ‘अखबार’

अरुण सिंह

अरुण सिंह

चुनाव के दौरान मेरी एक प्रत्‍याशी से मुलाकात हुई। उसने कहा- ‘‘मैं लगातार क्षेत्र में जनसम्‍पर्क कर रहा हूं। मीडिया वाले मेरे जनसम्‍पर्क की फोटो भी खींचकर ले जाते हैं लेकिन छाप नहीं रहे हैं। जनता का समर्थन भी मेरे साथ है। समाचार पत्र में और प्रत्‍याशियों का जनसम्‍पर्क लगातार छप रहा है। मैं भी एक दिन गया, बोला कि साहब मेरा भी जनसम्‍पर्क छाप दीजिए। लेकिन नहीं छाप रहे हैं। कहते हैं कि अखबार का पैकेज है। पैकेज खरीदोगे तो जनसम्‍पर्क छापेंगे। जबकि मेरे साथ जनता का समर्थन भी है। अब मैं उनका इतना महंगा पैकेज कैसे खरीद सकता हूं।’’

एक गरीब प्रत्‍याशी की फाइल फोटो

वास्‍तव में यह है विधानसभा चुनाव के दौरान अखबारों की कड़वी सच्‍चाई। बिना पैकेज दिए प्रत्‍याशी ‘गरीबदास’ का जनसम्‍पर्क भी नहीं छप सकता है। चाहे गरीबदास के साथ कितना भी जनसमर्थन क्‍यों न हो। समाचार पत्रों में चुनाव के दौरान पेड न्‍यूज को लेकर चुनाव आयोग काफी सख्‍त है। एक समाचार पत्र के सम्‍पादक को गिरफ्तार भी किया गया। लेकिन इसके बावजूद नामचीन और समाचार पत्रों को व्‍यवसाय बनाने वालों पर कोई भी असर नहीं पड़ रहा है। जो समाचार पत्र यह अपने पाठकों को भ्रमित करने के लिए यह कसमें खाते हैं कि वे चुनाव के दौरान पेड न्‍यूज नहीं छापेंगे। वह गरीबदास का जनसम्‍पर्क नहीं छाप रहे हैं। आखिर यह क्‍या है…? क्‍या जिस व्‍यक्ति के पास पैकेज खरीदने का पैसा नहीं है वह चुनाव लड़ने का अधिकारी नहीं है। खुद को गरीबों और निर्बलों की लड़ाई लड़ने वाले इन नामचीन अखबारों के पास इस बात का कोई जवाब है कि गरीब प्रत्‍याशियों के जनसम्‍पर्क की खबरें क्‍यों नहीं छापी जा रही हैं.? क्‍या गरीब समाचार पत्र नहीं पढ़ते हैं। गरीब रोज 3 से लेकर 5 रुपए खर्च करता है और अखबार खरीदकर पढ़ता है। गरीबों की बदौलत ही अखबार बताते हैं कि हमारे समाचार पत्र का प्रसार अधिक है। तो आखिर इन गरीबों के बीच से निकले प्रत्‍याशी का समाचार क्‍यों नहीं छापा जाता है .? केवल इसलिए कि उसके पास पैकेज खरीदने के लिए पैसा नहीं है।

प्रशासन और चुनाव आयोग को भी इन अखबारों से यह सवाल करना चाहिए कि आखिर क्‍यों अखबारों में केवल गिने चुने लोगों का ही जनसम्‍पर्क छापा जा रहा है.? जनसम्‍पर्क छापना है तो उनका भी छापिए जिनके पास कोई धनबल नहीं है। सभी जिलों के जिला निर्वाचन अधिकारियों का यह दायित्‍व बनता है कि वे और उनकी मीडिया मानीटरिंग सेल समाचार पत्रों को नोटिस देकर यह जवाब मांगे कि आखिर क्‍यों नहीं सभी प्रत्‍याशियों के जनसम्‍पर्क को उनके समाचार पत्र में जगह क्‍यों नहीं मिल रही है .?

अब जिलों के निर्वाचन अधिकारी यह सवाल पूछें या न पूछें। यह तो यह तो उनका दायित्‍व है। लेकिन जनता सब कुछ देख रही है। कुछ इसी तरह से कि….

सब देख रहे थे सरे बिस्मिल का तमाशा।

वो गौर से कातिल का हुनर देख रहा था।।

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