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मुलायम के अपमान पर कुछ यूं उभरा वरिष्‍ठ सपा नेता फिरोज अशरफ का दर्द

  • आधुनिकता में बुजुर्गों का सम्‍मान न भुलाया जाए
  • अगर समर्थन न करें तो यूं अपमान करने का हक नहीं

संतकबीरनगर। अरुण कुमार सिंह

नये कमरों में ये चीज़ें पुरानी कौन रखता है,परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है।
हमी दीवार को थामें रहे वरना,बजुर्गों की अनमोल निशानी कौन रखता है।।

मुनव्‍वर राना का ये शेर अनायास ही याद आ जाता है जब समाजवादी पार्टी का एक वरिष्‍ठ नेता पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के अपमान पर आहत दिखता है। हम बात कर रहे हैं सपा के वरिष्‍ठ नेता सैयद फिरोज अशरफ की। उन्‍होने अपने फेसबुक वाल पर अपने मन की व्‍यथा को कुछ यूं उकेरा है….

Newskbn, firoz ashraf

सैयद फिरोज अशरफ, वरिष्‍ठ समाजवादी नेता

‘‘ बहुत अफ़सोस हुआ जब नेता जी की फोटो को पैरो तले रौंदा गया और उनके खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगाये गए,पूछना चाहता हूँ कहा मर गयी थी सबकी मर्यादा ? जो वहाँ मौजूद लोगो ने होने दिया, सिर्फ यही नहीं कभी नेताजी के आदेशों पर नाचने वाले दो दो कौड़ी के लोगों को नेताजी के खिलाफ गैर शिष्टाचार / अपशब्दों और हैसियत सम्बन्धी बयान देते देखकर पीड़ा होती है। क्या आधुनिक समाजवाद की यही आधुनिकता है जिसमें बुजर्गों का सम्मान भुला दिया जाये.? क्या नेता जी इतने पराये हो गए? मुख्यमन्त्री जी का समर्थन करने वाले लोगों का मैं विरोधी नहीं हूँ ये आपकी ब्यक्तिगत मर्जी है की आप किसके साथ हो लेकिन ये कैसा समर्थन है जिनका आप समर्थन कर रहे हो जिनका आप सम्मान कर रहे हो उन्हीं के पिता के खिलाफ नारेबाजी, उन्हीं के पिता की तस्वीर को पैरों तले रौंदना ये कैसा समर्थन है.? क्या आधुनिक समाजवाद ने अपने संस्कार भी भुला दिए हैं.? ऐसी कौन सी कुर्सी ऐसा कौन सा पद है जो पिता के सम्मान से बढ़कर है.? मैंने जबसे किसी नेता को देखा है, जाना है, समझा है तो मुलायम सिंह यादव जी देश के पहले ऐसे नेता हैं जो अपने कार्यकर्ता के लिए लड़ते आये हैं। उन्होंने प्रशाशन को कभी अपने कार्यकर्ता पर गलतरूप से हावी नही होने दिया, कभी किसी गरीब की आवाज़ नहीं दबने दी। आज नेता जी के आदेशो की धज्जियां उड़ाई जा रही है। नेता जी बुजुर्ग भले ही हो गए पर राजनीति नहीं भूले। जहाँ नेता जी होंगें मै वही रहूँगा क्योंकि मुझे बुजुर्गो का साथ बुढापे में छोड़ना सही नहीं लगता।’’

उनकी इस बात पर खुर्शीद हैदर की गजल का यह शेर अनायास ही याद आ जाता है कि….

पोते ने दादा की फोटो,

यह कहकर बाहर रख दी।,

मेरा अलबम नया नया है,

यह तस्‍वीर पुरानी है।।

शायद ऐसा नहीं होना चाहिए था। तभी तो एक व्‍यक्ति के मन की व्‍यथा उजागर हुई। व्‍यथा तो कईयों के मन में उभरी होगी, लेकिन किसी ने उजागर नहीं किया।

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