Breaking News

ओमपुरी का फेमस डायलाग- मरने से पहले मेरे बाल डाई कर देना

कॉमेडी का तड़का हो या फिर मारधाड़ का मसाला ओम पुरी हर किरदार में फिट बैठ जाते हैं। उन्हें मेन स्ट्रीम इंडियन सिनेमा के साथ-साथ आर्ट फिल्मों के लिए भी जाना जाता है।अमेरिकन फिल्मों में भी उनका योगदान देखा जा सकता है। पद्मभूषण से सम्मानित हो चुके थे ओमपुरी । उनका जन्म 18 अक्टूबर 1948 को अंबाला, हरियाणा में हुआ था। ओम पुरी ने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत मराठी नाटक पर आधारित फिल्म ‘घासीराम कोतवाल’ से की थी।
यदि ओमपुरी की मानें तो फिल्म में उनके अच्छे काम के लिए उन्हें मूंगफली का भुगतान किया गया था। ओमपुरी ने अपने करियर में कई सुपरहिट फ़िल्में दी हैं। जहां फिल्मों में उन्हें एक्टिंग के लिए जाना जाता है, वहीं उनके कुछ डायलॉग भी काफी लोकप्रिय हुए है।

 फिल्म :आवारा पागल दीवाना
रिलीज का साल : 2002

 डायलॉग नं.1
‘हीरा…क्या गाय थी गांव में…10 लीटर दूध देती थी,,,जब ठुमक-ठुमक कर चलती थी तो सारे गांव के बैल उस पर मरते थे…उसका स्मारक बनाना’
 डायलॉग नं.2
 ‘जैसे ही मैंने उसकी कनपटी पर यह गनपट्टी रखी…उसका चेहरा बिना दूध की चाय जैसा पड़ गया ‘
 डायलॉग नं.3
 ‘मरने से पहले मेरे बाल डाई कर देना, आई वांट टू डाई यंग’
 डायलॉग नं.4
 ‘अगर मैं मर गया, मैं तुझे जिंदा नहीं छोडूंगा’

फिल्म : चुप चुप के
रिलीज का साल :2006
डायलॉग
‘ये मूंछ तेरे बाप के खेत पर नहीं उगाई है’

फिल्म : जाने भी दो यारो
रिलीज का साल :1983

डायलॉग नं.1
‘द्रौपदी तेरी अकेले की नहीं…हम सब शेयरहोल्डर हैं’
डायलॉग नं.2
‘शराबी तो शराबी की मदद करेगा’

फिल्म :मेरे बाप पहले आप
रिलीज का साल :2008

डायलॉग नं.1
‘सुना है आजकल छोटी-छोटी लड़कियों को हम जैसे बड़े लोग पसंद हैं…मेरे साथ ऐसा पहली बार हो रहा है’
डायलॉग नं.2
‘ये बगीचे इतने बड़े क्यों होते हैं, एक फूल-एक फब्बारा…बात ख़त्म…इतने ताम-झाम की क्या ज़रूरत’
डायलॉग नं.3
‘कुंडली से यारी तो क्या करेगी फौजदारी’

फिल्म :कमाल, धमाल, मालामाल
रिलीज का साल : 2012

डायलॉग :
‘शेर समझकर पैदा किया था…निकला बकरी’

फिल्म :मरते दम तक
रिलीज का साल : 1987

डायलॉग नं.1
‘हमारे धंधे में आंसू के साथ कोई रिश्ता नहीं होता’
डायलॉग नं.2
‘खून जब खौलता है तो मौत का तांडव होता है’

फिल्म :नरसिम्हा
रिलीज का साल :1991

डायलॉग नं.1
‘मुझे कोई नहीं मार सकता…न आगे से, न पीछे से…न दाएं से, न बाएं से…न आदमी, न जानवर…न अस्त्र, न शस्त्र’
डायलॉग नं.2
‘हर जूती यह सोचती है कि वह पगड़ी बन सकती है..मगर जूती की किस्मत है कि उसे पैरों तले रौंदा जाए…और पगड़ी का हक है कि उसे सर पर रखा जाए’
डायलॉग नं.3
‘मैं जब भी करता हूं, इंसाफ ही करता हूं’

फिल्म :ओह माय गॉड
रिलीज का साल :2012

 डायलॉग
 ‘मजहब इंसानों के लिए बनता है, मजहब के लिए इंसान नहीं बनते’

फिल्म : चक्रव्यूह
रिलीज का साल :2012

 डायलॉग
 ‘मैं ऐसे लोकतंत्र में विश्वास नहीं करता…जो गरीबों की इज्जत करना नहीं जानता’

फिल्म :अग्निपथ
रिलीज का साल :2012

 डायलॉग
 ‘जिस दिन पुलिस की वर्दी का साथ पकड़ा, उस दिन डर का साथ छोड़ दिया’

फिल्म :कुर्बान
रिलीज का साल :2009

 डायलॉग
 ‘यकीन को हमेशा वक़्त के पीछे चलना चाहिए…आगे नहीं’

फिल्म :गुप्त
रिलीज का साल :1997

 डायलॉग नं.1
 ‘समाज की गंदगी साफ़ करने का कीड़ा है मेरे अंदर’
 डायलॉग नं.2
 ‘एक वक़्त पर मैं सिर्फ एक ही काम करता हूं…जब पीता हूं तो खूब पीता हूं…और जब ड्यूटी करता हूं तो सिर्फ ड्यूटी करता हूं’
 डायलॉग नं.3
 ‘एक सच्चा आदमी ही अपने सर पर गोली खाने के लिए तैयार हो सकता है’

-----
लिंक शेयर करें