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आवास की आस में बीत गई रामप्‍यारी की आधी उमर

– विकलांग पति और बच्‍चों के साथ छप्‍पर में काट रही है जीवन

– आवास के लिए लगातार दौड़ रही है लेकिन नहीं मिल रहा आवास

धनघटा, संतकबीरनगर। आनन्‍द पाण्‍डेय

न हो कमीज तो पैरों से पेट ढक लेंगे।

ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।।

कहां तो तय था चरागां हरेक घर के लिए।

कहां चराग मयस्‍सर नहीं सहर के लिए ।।

newskbn pampyari

अपने विकलांग पति के साथ रामप्‍यारी

हिन्‍दी के गजलकार व कवि दुष्‍यन्‍त कुमार की ये लाइनें धनघटा तहसील क्षेत्र के साथी गांव की निवासी रामप्‍यारी के उपर खूब फबती हैं जिसकी आधी उमर ही आवास के लिए भटकने में गुजर गई। आज भी वह अपनी टूटी फूटी झोपड़ी में जिन्‍दगी के बचे हुए दिनों को काटने पर विवश है।

धनघटा क्षेत्र के साखी गांव की निवासी रामप्‍यारी का पति रामरेखा विकलांग है। ज‍बकि ससुर रामशब्‍द वृद्ध हो चला है। विकलांग पति, तीन बच्‍चों व ससुर की जिम्‍मेदारी रामप्‍यारी की ही है। कई बार उसने अधिकारियों और गांव के गणमान्‍य लोगों के सामने पक्‍के आशियाने के लिए गुहार लगाई। लेकिन उसकी गुहार अनसुनी कर दी गई। उसकी बातें नक्‍कारखाने में तूती की आवाज की तरह से दब जाती हैं। परिस्थितियों की मारी रामप्‍यारी की तरफ किसी का ध्‍यान गया ही नहीं। रामप्‍यारी की तीन संतानों में दो‍ बेटियां फूलमती और सोनमती जवानी की दहलीज पर कदम रख चुकी है। अब उनकी शादी की उमर हो रही है। लेकिन जब सर छिपाने के लिए छत ही नहीं है तो शादी के इन्‍तजाम आखिर कैसे हों। बेटा किशन जो अभी 14 साल का है वह भी किसी तरह से अपनी मां के साथ मिलकर लोगों के खेतों में जाकर काम करता है और परिवार के लिए दो रोटी का इन्‍तजाम करता है। आवश्‍यकता इस बात की है कि उनके परिवार को रोटी के साथ कपड़ा और मकान की आवश्‍यकता तो पूरी की जाए। अन्‍यथा फूंस के घर के अन्‍दर जवान होती बेटियों को किस हैवान की नजर लग जाए यह कहा नहीं जा सकता है।

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