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जिस सलीम ने यात्रियों को मौत के मुंह में ढकेला, उसे ही बना दिया हीरो

– अाखिर क्‍यों सलीम ने पंचर टायर को बनाने में बेवजह दो घण्‍टे लगा दिए
– क्‍यों नहीं सलीम ने मुकामी पुलिस या सेना को बस खराब होने की दी सूचना
– जम्‍मू काश्‍मीर ।
भारत के मीडिया चैनलों को सिर्फ खबर चाहिए, वे बिना जांच पड़ताल के किसी को भी हीरो और किसी को भी आतंकवादी बना देते हैं और बढ़ा चढ़ाकर ख़बरें दिखाकर अपनी TRP बढ़ाते हैं लेकिन जब बड़े बड़े नेता और मुख्यमंत्री मीडिया की बातों में आकर नासमझी भरे फैसले लेते हैं तो देखकर अफ़सोस होता है. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी ने ऐसी ही नासमझी दिखाकर उस ड्राईवर को हीरो बना दिया है जिसे तुरंत हिरासत में लेकर कड़ी पूछताछ करनी चाहिए और आतंकी हमले की असलियत जाननी चाहिए.
आप खुद सोचिये, जो ड्राईवर भोले भाले यात्रियों को झूठ बोलकर अमरनाथ श्राइन बोर्ड में बिना बस का रजिस्ट्रेशन कराए ही उन्हें अमरनाथ दर्शन कराने चला गया और जिसकी वजह से 7 निर्दोष यात्रियों की जान चली गयी, उसे ही मीडिया हीरो बना रही है और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी उसके लिए वीरता पुरस्कार की घोषणा कर दिए. भाई कम से कम ड्राईवर सलीम से यह तो पूछिए कि उसनें बस का रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं कराया, यात्रियों से क्यों झूठ बोला, उससे ये पूछिए कि वह भक्तों के काफिले से पीछे क्यों रह गया, जब उसकी बस पंक्चर हुई तो उसनें सुरक्षाबलों से क्यों नहीं बताया, अगर बस पंक्चर हुई तो उसे बनाने में इतना समय कैसे लग गया जबकि पंक्चर वाले टायर को बदलने में ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे लगते हैं लेकिन उसे 2 घंटे कैसे लग गए. इसके अलावा सलीम से यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर पंक्चर ठीक करने में 2 घंटे लग गए और रात हो गयी तो बस को किसी सुरक्षित जगह पर क्यों नहीं रोका, बिना सुरक्षा के बस क्यों चलाई और बस को अलग रास्ते पर क्यों ले गया. उसनें किसी को फोन क्यों नहीं किया, किसी से मदद क्यों नहीं माँगी.

सलीम से यह भी पूछा जाना चाहिए कि जब वह बस चला रहा था और आतंकियों ने फायरिंग कर दी तो उसे गोलियां क्यों नहीं लगी जबकि ड्राईवर सबसे खतरे वाली सीट पर होता है, अँधाधुंध फायरिंग के बाद ड्राईवर को गोली लगने के सबसे अधिक चांसेस होते हैं लेकिन उसे एक खरोच तक नहीं आयी, उससे यह भी पूछा जाना चाहिए कि आतंकियों ने उसके ऊपर गोली क्यों नहीं चलाई जबकि आतंकी सबसे पहले ड्राईवर को गोली मार देते हैं ताकि उन्हें ऐसे हमले करने में आसानी हो.

सलीम के बताये अनुसार वह दो किलोमीटर तक बिना देखे ही बस चलाता रहा, यह कैसे हो सकता है, खराब रास्ते पर बिना देखे कोई ड्राईवर बस कैसे चला सकता है, कहीं ऐसा तो नहीं है कि आतंकियों ने जान बूझकर उस पर गोली नहीं चलाई. कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई बड़ी साजिश की गयी हो.

सरकार ने सलीम को आनन फानन में हीरो बनाकर अपनी कमीं छुपाने का प्रयास किया है, लोग कह रहे हैं कि सलीम ने हिन्दुओं की रक्षा की है, अगर सलीम नहीं होता तो 50-60 हिन्दू यात्रियों की मौत हो जाती, भाई यह क्यों नहीं सोचते कि अगर अगर सलीम नहीं होता तो 7 यात्रियों की मौत ही नहीं होती क्योंकि सलीम ने नियम का उल्लंघन किया, थोड़े से पैसों के लालच में उसनें बस का रजिस्ट्रेशन ही नहीं कराया, बस को अलग रूट पर ले गया, किसी से मदद नहीं माँगी, बिना सुरक्षा के बस को रात में आतंक प्रभावित इलाके में घुमाता रहा.
सलीम से कई सवाल पूछे जा सकते हैं, अगर नियम का उल्लंघन करने वाले ड्राईवरों को ऐसे ही हीरो बनाया जाने लगेगा तो अमरनाथ श्राइन बोर्ड में कोई यात्रा का रजिस्ट्रेशन ही नहीं कराएगा, यात्रियों को ऐसे ही खतरे में डाला जाता रहेगा, ऐसे ही लोग मरते रहेंगे, हाँ सलीम खान जरूर हीरो माना जाता अगर उसनें बस का यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन कराया होता, थोडा सा शुल्क अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दिया होता. लेकिन थोड़े से पैसों के लालच में नियम तोड़ने वाले और 7 अमरनाथ यात्रियों को मरवाने वाले ड्राईवर को वीरता पुरष्कार देने की सिफारिश करना समझ से परे है. अब इस देश का भगवान ही मालिक है.

असल में तो ड्राइवर सीट पर थे हर्ष देसाई

सलीम ने खुद ही अपने पहले इण्‍टरव्‍यू में यह स्‍वीकारा था कि हर्ष भाई ने घायल होने के बाद मुझसे बस को चलाते रहने को कहा था। उनको दो गोलियां लगी थीं। इसके बाद भी वे बस चला रहे थे। लेकिन जब उनका खून ज्‍यादा बह गया तो हर्ष देसाई ने उसे बस को लेकर आगे चलने को कहा। तब तक वे खतरे वाले इलाके को पार कर चुके थे। वह जगह पार करने में उन्‍हें मात्र 20 सेकेण्‍ड ही लगे थे। लेकिन बाद में दोगलापन दिखाने और गंगा जमुनी तहजीब दिखाने और टीआरपी पाने के चक्‍कर में मीडिया ने यह गन्‍दा खेल खेला।

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