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प्राचार्य विवाद में राजनीति का अखाड़ा बनाया जा रहा है एचआरपीजी कालेज

 

  • जिस शिक्षक ने कालेज को राष्‍ट्रपति सम्‍मान दिलाया, उन्‍हें प्राचार्य बनाने में आखिर क्‍या दिक्‍कत
  • प्राचार्य का पदभार ग्रहण कराने में प्रबन्‍ध सचिव विनोद रुंगटा के द्वारा की जा रही है आनाकानी

संतकबीरनगर। न्‍यूज केबीएन

जिले की मिनी यूनिवर्सिटी माना जाने वाला एचआरपीजी कालेज इस समय प्राचार्य पद के लिए चल रही कुत्सित और स्‍वार्थपूर्ण राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय से लेकर कुलपति, डीएम और क्षेत्रीय उच्‍च शिक्षा अधिकारी तक कालेज को राष्‍ट्रपति सम्‍मान दिलाने वाले डॉ धर्मदेव सिंह को प्राचार्य पद का दायित्‍व देने के लिए निर्देश जारी कर चुके हैं। लेकिन डॉ धर्मदेव सिंह को कार्यवाहक प्राचार्य का दायित्‍व देने को लेकर कालेज के प्रबन्‍ध सचिव विनोद कुमार रुंगटा के द्वारा लगातार आनाकानी की जा रही है।

राष्‍ट्रपति प्रणव मुखर्जी से सम्‍मान प्राप्‍त करते हुए डॉ धर्मदेव सिंह

पहले कुलपति के निर्णय को लेकर देरी की गई। लेकिन जब कुलपति ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय के आदेश के बाद गत 24 जून 2016 को निर्णय दे दिया तब से लगातार उनके द्वारा आनाकानी की जाती रही। थक हारकर प्राचार्य पद के अर्ह डॉ धर्मदेव सिंह ने डीएम से गुहार लगाई। नतीजन क्षेत्रीय उच्‍च शिक्षा अधिकारी ने अबिलम्‍ब डॉ धर्मदेव सिंह को कार्यवाहक प्राचार्य पद पर कार्यभार ग्रहण कराने के लिए निर्देश दिए। अब कालेज के प्रबन्‍धक / सचिव विनोद कुमार रुंगटा इस आदेश का अनुपालन कराते हुए डॉ धर्मदेव सिंह को कार्यवाहक प्राचार्य का पदभार ग्रहण कराते हैं। या फिर पूर्वांचल के इस बेहतर कालेज को राजनीति का अखाड़ा बनाते हैं, यह तो आने वाला समय ही बताएगा। लेकिन फिलहाल व्‍यामोह में फंसे विनोद कुमार रुंगटा के द्वारा इस सम्‍बन्‍ध में कोई निर्णय समाचार लिखे जाने तक नहीं लिया गया है।

प्राचार्य पद को लेकर क्‍यों शुरु हुआ विवाद, क्‍या हुई कार्रवाई

गत 15 जुलाई 2016 को सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा विज्ञापन संख्या 39 के तहत चयनित एचआरपीजी कालेज खलीलाबाद के प्राचार्य डॉ अजय कुमार पाण्‍डेय की नियुक्ति को अवैध घोषित कर दिया गया था।

इसके बावजूद 1 अगस्‍त 2016 को सचिव प्रबन्‍ध समिति विनोद कुमार रुंगटा ने एक बार फिर एचआरपीजी कालेज के वरिष्‍ठ शिक्षकों की उपेक्षा करते हुए डॉ अजय कुमार पाण्‍डेय को कार्यवाहक प्राचार्य बना दिया।

30 अगस्‍त 2016 को विनोद कुमार रुंगटा ने कूटनीति के तहत कालेज के 5 वरिष्‍ठ शिक्षकों डॉ विजय कुमार अग्रवाल, डॉ रामाश्रय सिंह, डॉ धर्मदेव सिंह, डॉ रामसोच यादव व डॉ अजय कुमार पाण्‍डेय से यूजीसी के नियमन 2010 के आधार पर कार्यवाहक प्राचार्य की नियुक्ति के लिए आवेदन पत्र, बायोडाटा व प्रमाण पत्रों की छायाप्रति मांगी।

22 व 24 अक्‍टूबर 2016 को तीन शिक्षकों डॉ रामाश्रय सिंह, डॉ धर्मदेव सिंह व डॉ अजय कुमार पाण्‍डेय ने उपस्थित होकर अपने मूल अभिलेखों से छायाप्रति का मिलान कराया।

इस मिलान के बाद यह ज्ञात हुआ कि डॉ अजय कुमार पाण्‍डेय का एपीआई स्‍कोर 735.5, डॉ धर्मदेव सिंह का एपीआई स्‍कोर 641 व डॉ रामाश्रय सिंह का एपीआई स्‍कोर 132.5 है।

यूजीसी विनियमन 2010 यह कहता है कि प्राचार्य बनने के लिए न्‍यूनतम 400 एपीआई स्‍कोर की जरुरत है। अगर कई शिक्षकों के एपीआई स्‍कोर 400 से अधिक हैं तो उनमें से जो शिक्षक वरिष्‍ठता के क्रम में आगे है उसे प्राचार्य नियुक्‍त किया जाए।

इस हिसाब से डॉ रामाश्रय सिंह एपीआई स्‍कोर के आधार पर छंट गए। बचे दो शिक्षकों में डॉ धर्मदेव सिंह वरिष्‍ठता क्रम में डॉ अजय कुमार पाण्‍डेय से उपर थे और प्राचार्य बनने के अधिकारी थे।

इसके बावजूद सचिव प्रबन्‍ध समिति विनोद कुमार रुंगटा ने नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए 25 अक्‍टूबर 2016 को डॉ अजय कुमार पाण्‍डेय को एक बार फिर कार्यवाहक प्राचार्य बना दिया। उसके पीछे तर्क यह था कि उनका एपीआई स्‍कोर सबसे अधिक है। जो पूरी तरह से नियम विरुद्ध था। नियम यह है कि जो न्‍यूनतम 400 एपीआई स्‍कोर की अर्हता रखता हो और 400 से अधिक एपीआई स्‍कोर की अर्हता रखने वालों में वरिष्‍ठ हो उसे प्राचार्य बनाया जाए।

कालेज के प्रबन्‍ध सचिव विनोद कुमार रुंगटा के इस नियम विरुद्ध की गई कार्रवाई के विरुद्ध डॉ रामाश्रय सिंह और डॉ धर्मदेव सिंह ने सिद्धार्थ यूनिवर्सिटी के कुलपति के समक्ष अपना प्रत्‍यावेदन प्रस्‍तुत किया।

कार्यवाहक प्राचार्य के अर्हता निर्धारण के सम्‍बन्‍ध में सचिव प्रबन्‍ध समिति विनोद कुमार रुंगटा, डॉ अजय कुमार पाण्‍डेय, रामाश्रय सिंह व डॉ धर्मदेव सिंह ने विभिन्‍न तिथियों पर यूनिवर्सिटी में पहुंचकर समय समय पर अपना लिखित पक्ष रखा।

सभी पक्षकारों के द्वारा प्रस्‍तुत किए गए अभिलेखों व साक्ष्‍यों का कुलपति सिद्धार्थ यूनिवर्सिटी के द्वारा परीक्षण किया जा रहा था। इस बीच डॉ रामाश्रय सिंह ने 22 मई 2017 को उच्‍च न्‍यायालय में याचिका दाखिल की।

इसके बाद उच्‍च न्‍यायालय ने 26 मई 2017 को पारित आदेश में कुलपति को यह निर्देश दिया कि 1 महीने के अन्‍दर इस प्रकरण को निस्‍तारित करके अपना निर्णय दें।

एक माह की समयावधि पूरी हो इसके पहले ही 24 जून 2017 को कुलपति प्रो रजनीकान्‍त  पाण्‍डेय ने यह निर्णय दिया कि प्राचार्य पद की अर्हता रखने वालों में डॉ धर्मदेव सिंह एसोसिएट प्रोफेसर वाणिज्‍य कार्यवाहक प्राचार्य के लिए अर्ह हैं।

इस निर्णय के बावजूद एचआरपीजी कालेज प्रबन्‍ध समिति के सचिव विनोद कुमार रुंगटा ने डॉ धर्मदेव सिंह को कार्यवाहक प्राचार्य पद का कार्यभार ग्रहण नहीं कराया।

इसके बाद 11 जुलाई 2017 को डॉ धर्मदेव सिंह ने जिलाधिकारी संतकबीरनगर मारकण्‍डेय शाही को अपना प्रत्‍यावेदन दिया।

जिलाधिकारी ने प्रत्‍यावेदन को देखा और उसमें लिखित आदेशों का अनुपालन कराने के लिए क्षेत्रीय उच्‍च शिक्षा अधिकारी डॉ राजीव पाण्‍डेय को आदेश दिया।

इस क्रम में क्षेत्रीय उच्‍च शिक्षाधिकारी डॉ राजीव कुमार पाण्‍डेय ने सचिव/ प्रबन्‍धक एचआरपीजी कालेज विनोद कुमार रुंगटा को यह पत्र लिखा कि कालेज में वरिष्‍ठतम एसोसिएट प्रोफेसर डॉ धर्मदेव सिंह को कार्यवाहक प्राचार्य का पदभार ग्रहण कराएं। साथ ही साथ प्राचार्य पद का पदभार ग्रहण कराने के पश्‍चात जिलाधिकारी संतकबीरनगर और उन्‍हें खुद इस कार्रवाई से अवगत कराएं।

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