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शिक्षकों का वर्गीकरण करके सरकारों ने शिक्षा व्‍यवस्‍था के साथ किया मजाक : श्रीनरायन सिंह

  • शिक्षामित्रों का समायोजन करके समस्‍याओं का करें निदान
  • वर्तमान संकट के लिए केन्‍द्र व प्रदेश सरकारें हैं दोषी

संतकबीरनगर। न्‍यूज केबीएन

श्रीनरायन सिंह

गोरखपुर- फैजाबाद स्‍नातक निर्वाचन क्षेत्र से पूर्व प्रत्‍याशी और नरेन्‍द्रदेव कृषि विश्‍वविद्यालय फैजाबाद के कार्यपरिषद के पूर्व सदस्‍य श्रीनरायन सिंह ‘कौशिक’ ने वर्तमान शिक्षा मित्र संकट को लेकर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए केन्‍द्र व प्रदेश की सरकारों पर तल्‍ख टिप्‍पडी़ की है। उन्‍होने कहा कि राजनैतिक हितों को लेकर सरकारों ने हमेशा शिक्षा व्‍यवस्‍था के साथ खिलवाड़ किया है। शिक्षकों का वर्गीकरण अपनी सुविधा के अनुसार कर दिया। एक ही संवर्ग में पढ़ाने वाले शिक्षकों के कई नाम दिए, कई सुविधाएं दीं… जरुरत पड़ी तो जब मन किया तब उन सुविधाओं को छीन लिया। सभी पार्टियों ने अपनी सुविधा के हिसाब से शिक्षकों का वर्गीकरण किया और राजनैतिक लाभ के लिए उन्‍हें पेण्‍डुलम की तरह से हिलाते रहे। आज जब शिक्षा मित्र चौथेपन में पहुंच गया है, तो उसे नियति के सहारे छोड़ दिया गया।

सुविधानुसार वर्गीकरण आखिर क्‍यों ?

शिक्षकों का जिस तरह से वर्गीकरण अब तक किया गया वह काफी हास्‍यास्‍पद है। एक ही काम करने वाले शिक्षकों में कभी उन्‍हें शिक्षामित्र कहा, कभी अनुदेशक, कभी व्‍यावसायिक शिक्षक तो कभी अंशकालिक और पूर्णकालिक, सहायक अध्‍यापक  में विभाजित करने का काम किया गया। उपरोक्‍त सभी का काम एक ही है। लेकिन हर पद का वेतन व सुविधाएं अलग – अलग है। आखिर ऐसा क्‍यों किया जा रहा है। इसका जबाव क्‍या किसी के पास है ? अगर जबाव यह है कि शिक्षा व्‍यवस्‍था को पटरी पर लाने के लिए किया गया…. तो इस शिक्षा व्‍यवस्‍था को पटरी पर लाने लाने वाले शिक्षा मित्रों के साथ उस समय यह अन्‍याय क्‍यों जब वे इस व्‍यवस्‍था को सुधारने में अपनी जवानी के दिनों को दाव पर लगा चुके हैं।

राजनेता एक देश एक व्यवस्था की बात करते है लेकिन एक देश एक समान शिक्षा व्यवस्था की बात नहीं करते हैं। जिस तरह देश में राजनीति का रूप विभिन्न धर्म और जातियों में बंटा है। उसी प्रकार देश और प्रदेशो की सरकारो ने शिक्षको को कई वर्गो में बाट दिया और इनके नामकरण भी कर दिया। इसका भी कारण है की अपनी सुविधा अनुसार इनकी नियुक्ति किया। वित्त विहीन स्‍कूलों और वित्‍तपोषित शिक्षकों को बोर्ड के कापियों के मूल्यांकन में  जितना मानदेय वित्त पोषित स्‍कूल के शिक्षक को मिलता है उतना ही वित्त विहीन के शिक्षक को मिलता है। लेकिन उससे इतर वित्त पोषित का शिक्षक जब विद्यालय में शिक्षण कार्य करता है 70 हजार वेतन पाता है, और वित्त विहीन का शिक्षक पन्द्रह सौ से दो हजार पाता है । यदि वह यह कहता है कि समान योग्यता समान कार्य तो समान वेतन लेकिन सरकारो को यह मंजूर नहीं, इसमें उसका क्या अपराध है। उसी प्रकार तदर्थ शिक्षक उनकी नियुक्ति प्रबन्ध तन्त्र ने उस समय की सरकारों द्वारा निर्धारित योग्यता के आधार पर किया, लेकिन 1993 से उनका विनियमितीकरण अभी तक नहीं हुआ। कुछ लोग तर्क दे रहे है दो लाख टीईटी पास नौजवान बेकार थे, और पूर्व की सरकार ने उन्हें अवसर न देकर शिक्षा मित्रों को सहायक अध्यापक बना दिया। मैं अपने सभी नौजवान भाइयों और उन तथाकथित शिक्षक नेताओं और राजनेताओं से पूछना चाहता हूं कि जव शिक्षा मित्रो का चयन किया गया था, तो क्या योग्यता परास्नातक ,बीएड ,या टीईटी उत्‍तीर्ण रखी गयी थी। या फिर सबसे कम नम्बर पाने वाले ग्राम सभा के छात्र का चयन हुआ था। उतनी योग्यता के अध्यापक प्राइमरी स्कूल में सहायक अध्यापक के रूप में नहीं पढ़ा रहे थे। यदि यह सब सही है तो जो नौजवान टीईटी पास है उनकी लड़ाई अपने ही परिवार के भाइयो व देश व प्रदेश की सरकारों से जायज है? जो लोग देश की सत्ता पर नौजवानों को रोजगार मिलना चाहिए की नहीं, जैसे जुमले कह कर पहुचे हैं। उनसे टीर्इटी उत्‍तीर्ण नौजवान साथी पूछें कि आखिर उनकी नौकरी कहां गई। जहा तक शिक्षा मित्रो के टीईटी उत्‍तीर्ण होने के विषय पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने जो टिप्‍पड़ी किया है उनसे मैं विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि पूर्व में जो शिक्षक प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा देते थे वह टीईटी पास नही थे। न ही उच्च शिक्षा प्राप्त लेकिन उनके पढ़ाए हुए छात्र आज उच्‍च पदों पर हैं। देश और प्रदेश की सरकार से विनम्रता पूर्वक अनुरोध है कि शिक्षा व्यवस्था में शिक्षा मित्रों के दिये गये योगदान को न भूलें। क्‍योंकि जब प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था चरमरा रही थी। उस समय शिक्षा मित्रों ने सम्भाला था। उस समय के यदि समाचार पत्रों का अवलोकन किया जाये तो पता चलेगा कि उस समय अखबारों में यह छपा करता था कि – ‘‘ प्राथमिक विद्यालय शिक्षा मित्रो के भरोसे चल रहे हैं।’’ उपर्युक्त बातों को अवलोकन करते हुए शिक्षा मित्रो के समायोजन के लिए देश और प्रदेश की सरकार कोई रास्ता निकाले तो बेहतर होगा।

 

अहिंसात्‍मक लड़ाई में मैं भी शिक्षा मित्रों के साथ

श्रीनरायन सिंह ने शिक्षा मित्रों से अपील करते हुए कहा कि मैने भी वर्ष 2009-10 में हुए शिक्षा मित्रों के आन्‍दोलन का मैं भी साथी रहा । मैं इस दौरान गोरखपुर जेल में भी बन्‍द हुआ था। बन्द हुआ था आप की नियुक्ति लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पड़ी किया है तो इस निर्णय पर सरकार को ही निर्णय लेना है। लेकिन शिक्षा मित्र आन्‍दोलन के दौरान अपनी जो जान देने का प्रयास कर रहे हैं वह गलत है। वे अपने संघर्षों विश्‍वास रखें। आप के सघर्षो में साथ था साथ हूँ और साथ रहूँगा।

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