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कविता

सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – द्रविड़ की देह से बहता लहू हूँ मैं अनार्यो का लहू हूँ…..

पुरबिया सूरज एक लम्बी यात्रा से लौट पहाड़ी नदी में घोड़ों को धोने के बाद हाँक देता है काले जंगलों में चरने के लिए और रास्ते में देखे गए दृश्यों को घोंखता है…. चाँद पेड़ के तने पर चमकता है जैसे जीन से लटकती हुई हुक और रेवा के किनारे मैं द्रविड़ की देह से बहता लहू हूँ मैं अनार्यो ...

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सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – जीवन अब भी तिरस्कृत है संसद की कार्यवाही से निकाले गए वाक्य की तरह…

क्या तुम कविता की तरफ़ जा रहे हो ? नहीं, मैं दीवार की तरफ़ जा रहा हूँ । फिर तुमने अपने घुटने और अपनी हथेलियाँ यहाँ क्यों छोड़ दी हैं ? क्या तुम्हें चाकुओं से डर लगता है ? नहीं मैं सहनशीलता को साहस नहीं कहता । और न दुहराना ही चाहता हूँ पैसे भर जुबान से पिछली उपलब्धियाँ : अपनी भूख और लड़कियाँ ...

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सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – हर ईमान का एक चोर दरवाज़ा होता है जो सण्डास की बगल में खुलता है…

बाड़ियाँ फटे हुए बाँसों पर फहरा रही हैं और इतिहास के पन्नों पर धर्म के लिए मरे हुए लोगों के नाम बात सिर्फ़ इतनी है स्नानाघाट पर जाता हुआ रास्ता देह की मण्डी से होकर गुज़रता है और जहाँ घटित होने के लिए कुछ भी नहीं है वहीं हम गवाह की तरह खड़े किये जाते हैं कुछ देर अपनी ऊब ...

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सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – मुंहदुब्‍बर ….पहले उसे थाली खाती है फिर वह रोटी खाता है

करछुल… बटलोही से बतियाती है और चिमटा तवे से मचलता है चूल्हा कुछ नहीं बोलता चुपचाप जलता है और जलता रहता है औरत… गवें गवें उठती है…गगरी में हाथ डालती है फिर एक पोटली खोलती है। उसे कठवत में झाड़ती है लेकिन कठवत का पेट भरता ही नहीं पतरमुही (पैथन तक नहीं छोड़ती) सरर फरर बोलती है और बोलती रहती ...

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सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – दीवार पर हाथ रखते और कहते… यह मेरा घर है

मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीर्थ-यात्रा की बस के दो पंचर पहिये हैं। पिता की आँखें… लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं। बेटी की आँखें… मंदिर में दीवट पर जलते घी के दो दिये हैं। पत्नी की आँखें, आँखें नहीं हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं। वैसे हम स्वजन हैं, करीब हैं ...

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सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – लोहे का स्‍वाद लुहार से मत पूछो……

शब्द किस तरह कविता बनते हैं इसे देखो अक्षरों के बीच गिरे हुए आदमी को पढ़ो क्या तुमने सुना कि यह लोहे की आवाज़ है या मिट्टी में गिरे हुए ख़ून का रंग। लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है। -----

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सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – जड़ों से कहो कि अंधेरे में बेहिसाब न दौड़ें……

हवा गरम है और धमाका एक हलकी-सी रगड़ का इंतज़ार कर रहा है कठुआये हुए चेहरों की रौनक वापस लाने के लिए उठो और हरियाली पर हमला करो जड़ों से कहो कि अंधेरे में बेहिसाब दौड़ने के बजाय पेड़ों की तरफदारी के लिए ज़मीन से बाहर निकल पड़े बिना इस डर के कि जंगल सूख जाएगा यह सही है कि ...

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सुदामा पाण्‍डेय ध‍ूमिल ( कविता ) – सच को भी सबूत के बिना बचा पाना मुश्किल है…..

वहाँ न जंगल है न जनतंत्र भाषा और गूँगेपन के बीच कोई दूरी नहीं है। एक ठंडी और गाँठदार अंगुली माथा टटोलती है। सोच में डूबे हुए चेहरों और वहां दरकी हुई ज़मीन में कोई फ़र्क नहीं हैं। वहाँ कोई सपना नहीं है। न भेड़िये का डर। बच्चों को सुलाकर औरतें खेत पर चली गई हैं। खाये जाने लायक कुछ ...

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सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – क्योंकि हम पेशेवर गरीब हैं…

मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीर्थ-यात्रा की बस के दो पंचर पहिये हैं। पिता की आँखें… लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं। बेटी की आँखें… मंदिर में दीवट पर जलते घी के दो दिये हैं। पत्नी की आँखें, आँखें नहीं हाथ हैं, जो मुझे थामे हुए हैं। वैसे हम स्वजन हैं, करीब हैं ...

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सुदामा पाण्‍डेय धूमिल ( कविता ) – गांव : लगता है यह गाँव नरक का भोजपुरी अनुवाद है

मूत और गोबर की सारी गंध उठाए हवा बैल के सूजे कंधे से टकराए खाल उतारी हुई भेड़-सी पसरी छाया नीम पेड़ की। डॉय-डॉय करते डॉगर के सींगों में आकाश फँसा है। दरवाज़े पर बँधी बुढ़िया ताला जैसी लटक रही है। (कोई था जो चला गया है) किसी बाज पंजों से छूटा ज़मीन पर पड़ा झोपड़ा जैसे सहमा हुआ कबूतर ...

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