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संसद भवन से आई आवाज…..

अश्विनी कुमार, सम्‍पादक पंजाब केशरी

संसद भवन से यह पुरजोर ऐलान करने में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पूरी तरह सफल रहे हैं कि उनकी सरकार गरीबों की सरकार है और गरीबों को समर्पित सरकार है। बिना शक आज राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर रखे गये धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा पूरी होने से पहले कुछ लज्जाजनक नजारे देखने को मिले मगर इससे हमारे लोकतन्त्र की उस ताकत पर कोई अन्तर नहीं पड़ता जिसमें गरीब व वंचित व्यक्ति को अधिकार सम्पन्न करने का बीड़ा उठाया है। सरकारें आती-जाती रहती हैं मगर उनकी छवि आम जनता को पकड़े रहती है। पिछली मनमोहन सरकार ने भी लोगों के लिए काम जरूर किये होंगे मगर उसकी छवि घोटालों की सरकार की बन गई और अभी तक जारी हैं। इसमें सरकार का नेतृत्व संभालने वाले राजनीतिज्ञ की क्षमता और व्यक्तित्व की भूमिका बहुत ज्यादा होती है। श्री मोदी के नेतृत्व के बारे में जो छवि देश की आम जनता के मन में बनी है वह एक निडर, राष्ट्रभक्त और गरीबों के लिए लडऩे वाली सरकार की बनी है। अत: यदि श्री मोदी ने आज राज्यसभा में विमुद्रीकरण के मुद्दे पर गरीबों का खुद को पैरोकार बताने वाले कम्युनिस्टों को आइना दिखाया है तो वह पूरी तरह जायज कार्रवाई है। कांग्रेस पार्टी के सदन में उपनेता आनंद शर्मा ने प्रधानमन्त्री के उस कथन को अपने वक्तव्य में चुनौती दी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि 1971 में जब इंदिरा जी प्रधानमन्त्री थीं और स्व. यशवन्त राव बलवन्त राव चव्हाण वित्तमन्त्री थे तो तब गठित वांछू समिति ने पुराने नोटों को बन्द करके नये नोट चलाने की अनुशंसा की थी। मगर श्रीमती इंदिरा गांधी ने इसकी रिपोर्ट को नहीं माना था और चव्हाण जी से कहा था कि क्या कांग्रेस पार्टी को आगे चुनाव नहीं लडऩा है। यह समिति भ्रष्टाचार समाप्त करने और कालेधन से निजात पाने के मुद्दे पर विचार करने के लिए गठित की थी। इस घटना का विवरण यशवन्त राव चव्हाण के कार्यालय में नियुक्त एक वरिष्ठ अधिकारी ने अपनी पुस्तक में किया है। श्री शर्मा ने इसका उद्धरण देने को सही नहीं माना। अगर श्री शर्मा को अपनी पार्टी का राज्यसभा में उपनेता होने के बावजूद इतना भी सलीका नहीं है कि प्रधानमन्त्री चाहे सदन के भीतर बोलें या बाहर बोलें मगर वह ऐतिहासिक तथ्यों और सरकारी रिकार्डों की सत्यता से बाहर नहीं जा सकते। अत: श्री मोदी ने आज सदन में अपने जवाब में वह तथ्य पेश कर दिया जिसे दुनिया की कोई ताकत चुनौती नहीं दे सकती। 1971-72 में इंदिरा गांधी की सरकार कालेधन की, कालेधन के लिए और कालेधन से चलने वाली सरकार बताने वाला कोई और नहीं था बल्कि माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मूर्धन्य नेता स्व. ज्योतिर्मय बसु थे। वह संसद में शेर की दहाड़ की तरह बोलते थे और पूरी सरकार को हिला दिया करते थे। श्री बसु ही 1971 में तैयार की गई वांछू समिति की रिपोर्ट को लगभग डेढ़ साल बाद संसद के पटल पर रखने में कामयाब हुए थे और उन्होंने मांग की थी कि भ्रष्टाचार और कालेधन से निजात पाने के लिए विमुद्रीकरण किया जाना चाहिए। श्री बसु प. बंगाल की डायमंड हार्बर लोकसभा सीट से जीत कर लोकसभा में पहुंचते थे और तत्कालीन कांग्रेस सरकार की उन नीतियों का पुरजोर विरोध करते थे जिन्हें वह जन विरोधी समझते थे। अत: श्री मोदी ने संसद भवन से ही वह आवाज सड़क तक पहुंचाने में सफलता हासिल की जिसके लिए 40 साल पहले गरीबों के हमदर्द जोर लगा रहे थे। विमुद्रीकरण श्री मोदी के अभी तक के कार्यकाल का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक व साहसिक फैसला है जिसका मजाक बनाने की असफल कोशिश कुछ विपक्षी दलों ने की है। इनमें भी कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस सबसे ऊपर हैं मगर ऐसा करके उन्होंने अपने दामन को किस तरह दागदार बना लिया है इसका अन्दाजा उन्हें आने वाले वक्तों में ही हो पायेगा। क्योंकि विमुद्रीकरण का सीधा लाभ अब गरीबों को ही पहुंचेगा और उन्हें जिस भी सरकारी योजना में जितना हिस्सा मिलता है वह उनके जनधन खातों में बिना बिचौलियों के पहुंचेगा। गरीब के दर्द को गरीब ही बेहतरी से समझ सकता है। इसलिए धन्यवाद प्रस्ताव के साथ संसद भवन से आवाज आयी है कि गरीबों की सरकार पीछे नहीं हटेगी और गरीबों को उनका हक मिल कर ही रहेगा।

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