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दुष्‍यन्‍त कुमार की क्रान्तिकारी रचना

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं मेरी कोशिश है कि ये ...

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मत कहो आकाश में कोहरा घना है …… दुष्‍यन्‍त कुमार की गजल

मत कहो आकाश में कोहरा घना है, यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। सूर्य हमने भी नहीं देखा सुबह का, क्या कारोगे सूर्य का क्या देखना है। हो गयी हर घाट पर पूरी व्यवस्था, शौक से डूबे जिसे भी डूबना है। दोस्तों अब मंच पर सुविधा नहीं है, आजकल नेपथ्य में सम्भावना है. -----

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